...आज जब मैं दिल्ली से रोहतक आ रहा था- कबीर पर
बोलने के लिए तो अचानक तुलसीदास याद आए। हुआ यह कि रास्ते के दोनों ओर बड़ी संख्या
में खिले हुए कास देर तक दिखते रहे। तुलसीदास उन्हीं खिले हुए कासों के कारण याद
आए- ‘फूले कास सकल मही छाई, जनु
बरखाकृत प्रकट बुढ़ाई’| तुलसीदास की इस चौपाई में वर्षा ऋतु के खत्म
होने का खिले हुए कासों के जरिए जो कलात्मक वर्णन है, उससे
उस कवि की काव्य-शक्ति का अनुभव हुआ। यहाँ कोई सगुण-निर्गुण विवाद नहीं, गहन
जीवन-बोध है। फिर दूसरे प्रसंग में कबीर की भी पंक्तियाँ याद आईं और जीवन के गहन-गंभीर
प्रश्नों से साक्षात्कार करने की निर्भय शैली की याद आई -
वेद कहे सरगुन के आगे निरगुन का
बिसराम।
सरगुन-निरगुन तजहु सोहागिन, देख
सबहि निज धाम।।
यह कबीर का सूफियाना राग है जिसमें
सगुण-निर्गुण से परे सच्ची आध्यात्मिकता पर जोर है। और उसी के साथ यह भी याद आया
कि हिंदी आलोचना में कबीर और तुलसी को आपस में भिड़ाने का जो सिलसिला चल निकला है, वह
एक तरह से रक्तरंजित विवाद में बदल चुका है। सगुण-निर्गुण, ज्ञानमार्गी-राममार्गी
नाम से जो बंटवारे आलोचकों ने कर रखे हैं, उनके जरिए इन दोनों कवियों के केंद्रीय भावों
को समझने की बजाय दोनों को एक-दूसरे के विपरीत साबित करने पर ही जोर ज्यादा है। आज
हमारे लिए वे केंद्रीय भाव ज्यादा जरूरी हैं,
बनिस्बत भेद के। बहरहाल, कबीर
और तुलसी को आपस में लड़ाने का जो आलोचनात्मक सिलसिला है, यहाँ
उससे अपने को अलग रखते हुए मैं कबीर पर कुछ बातें निवेदित करूंगा।
कुछ दिनों पहले मुझे इस संगोष्ठी में व्याख्यान
देने के लिए आमंत्रित किया गया और विषय बताया गया - ‘कबीर-कल
आज और कल’ तो मुझे अपने छात्र जीवन की एक फिल्म याद आई।
फिल्म राजकपूर की थी। नाम था- ‘कल आज और कल’। फिल्म में पृथ्वीराज कपूर दादा की
भूमिका में हैं, राजकपूर पुत्र की भूमिका में और रणधीर कपूर, उनकी
यह पहली फिल्म थी, पोते की भूमिका में हैं। जहाँ तक याद है, 1970-72
में यह फिल्म बनी थी। इसमें राजकपूर ने तीन पीढ़ियों का संघर्ष दिखाया है। दादा
अपनी मान्यताओं और अपने मूल्यों से बंधा हुआ है। वह मानता है कि हम जो कर रहे हैं, हमारा
जो समय है, वह सही है। पोता अपने ढंग से जीना चाहता है, दादाजी
सुबह चार बजे उठते हैं और भजन गाते हैं, पोता देर तक सोता है और उठकर जोर-जोर से
पश्चिमी संगीत बजाता है। इसके कारण दादा और पोते के बीच टकराहट होती है। राजकपूर
उनमें से एक का पुत्र है और दूसरे का पिता। वह पिता को सम्मान देना चाहता है और
बेटे को प्यार, लेकिन उसके लाख प्रयत्न के बाद भी दादा और पोते
में मेल-मिलाप नहीं होता। पिता उसे अपनी ओर खींच रहा है और पुत्र अपनी ओर। दादा और
पोते की इस खींचतान में पिता यानी राजकपूर की चिंता किसी को नहीं है। दोनों की
आपसी खींचतान में वह सैंडविच बना हुआ है। अंत में जो निष्कर्ष हाथ आता है, जहां
तक मुझे याद है, वह यह कि राजकपूर अंत में कहता है कि एक को
अपने बीते हुए कल की चिंता है, दूसरे को आने वाले कल की; मैं
जो आज हूं, मुझ आज की चिंता किसी को नहीं। उस फिल्म में जो
तनाव है, अतीत, वर्तमान और भविष्य का, वह
तीन पीढ़ियों का है। वह राजकपूर के समय में भी था और हमारे समय में भी है। आज यहाँ
संगोष्ठी का जो विषय है, उसमें भी यह तनाव है। जहां तक मैं समझ रहा हूँ आयोजकों
की चिंता यह है कि कबीर कैसे थे कल, कैसे हैं आज, और कैसे होंगे भविष्य में?
मेरी एक सहज जिज्ञासा है कि क्या किसी
कवि की इतने लंबे कालखंड में प्रासंगिकता ढूंढ़ना ठीक है? वह
कल भी प्रासंगिक था, आज भी है और भविष्य में भी बना रहेगा- मुझे
लगता है कि किसी कवि से ऐसी अपेक्षा रखना उसके साथ न्याय नहीं है। हर रचनाकार को
अपने समय में फिट कर देने की इस प्रवृत्ति को कभी नामवर सिंह ने ‘प्रासंगिकता
का प्रमाद’ कहा था। उन्होंने लिखा है: ‘प्रासंगिक
क्या वही है जो हमारे विचारों का अनुमोदन करता है और आज के अनुकूल है? जो
आज से भिन्न है और हमें चुनौती देता है, वह प्रासंगिक क्यों नहीं? आज
यह सवाल उठाना इसलिए जरूरी है कि प्रासंगिकता की चिंता प्रमाद की सीमा तक बढ़ गई
है। अतीत के हर बड़े लेखक को किसी-न-किसी तरह समकालीन बनाने की ऐसी कोशिश हो रही है
कि अतीत की अतीतता तो सुरक्षित रही नहीं, वर्तमान की अपनी विशिष्टता भी लुप्त हो रही है-
यहाँ तक कि अतीत और वर्तमान का अंतर मिटता जा रहा है और इस तरह आज की ज्वलंत
समस्याओं से बच निकलने का बहाना मिल रहा है।’
मैं भी यह समझता हूँ कि इतने लंबे
कालखंड में महान से महान आदमी प्रासंगिक ही बना रहे, यह जरूरी नहीं। मेरे पिता जी बहुत
अच्छे आदमी थे। मेरी तुलना में कई अर्थों में बहादुर आदमी थे। जिन अर्थों में वे
बहादुर थे, उन अर्थों में मैं बहादुर नहीं। लेकिन स्त्रियों
के बारे में, जातियों के बारे में, उनके
जो विचार थे, वे कहे नहीं जा सकते। वे अपने मुसलमान दोस्तों
के लिए जान दे सकते थे, लेकिन उसके साथ बैठकर खा नहीं सकते थे। हम खाना
खा लेते हैं, अपने किसी मुसलमान दोस्त के लिए जान देने की
बात आएगी तो सौ बार सोचेंगे। तब क्या मेरे पिताजी मेरे किसी काम के नहीं रहे? अपने
उपन्यास- शायद ‘ढाई घर’
में गिरिराज किशोर ने इस सवाल को उठाते
हुए कहा है- कि हमने छोटी समस्या तो हल कर ली,
थाली और रोटी की समस्या हल कर ली, साथ
खाने लगे लेकिन जो बड़ी समस्या थी, दिल के मिलने की समस्या- वह और बड़ी होती गई है।
जब मेरे और मेरे पिताजी के समय में इतना अंतर आ गया है, यह
समस्या ज्यादा जटिल हो गयी है, तब सोचिए कबीर तो चार-पांच सौ वर्ष पहले हुए
थे। उनकी प्रासंगिकता पर आज यदि हम विचार कर रहे हैं तो यह जाहिर है कि सामान्य
तौर पर एक भले और अच्छे आदमी से वे लाख गुना अच्छा और आगे के थे। हमारे समय में
हिंदू-मुसलमान की समस्या जितनी भयावह है, वह कबीर के समय से अधिक है। हमारा समय कबीर के
समय से अधिक असहिष्णु है। वे आज होते तो उन्हें अपनी साखियाँ कहने में हजार
परेशानियाँ उठानी पड़तीं। मैं एक उदाहरण देना चाहूँगा।
मैं 2000 से 2004 तक हैदराबाद के केंद्रीय
विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य कर रहा था। उस बीच वहाँ चंद्रबाबू नायडू की सरकार
थी। आंध्र प्रदेश के इंटरमीडिएट हिंदी पाठ्यक्रम में कबीर की ‘साखियाँ’ पढ़ाई
जाती थीं। उनमें एक साखी थी- ‘कांकड़-पाथर जोरि के, मसजिद
लियो बनाय।’ सवाल उठे कि यह मस्जिद का मजाक है। एक खास
संप्रदाय के लोगों ने कहा कि यह हमारी भावना पर चोट है। आप जानते हैं कि चुनावी
राजनीति के कारण सरकारें कितनी छुई-मुई हो गई हैं। जहाँ तक मुझे याद है कि बिना
अर्थ जाने, बिना आशय समझे, असुविधाजनक साखियों को हटा दिया गया।
हो सकता है- वेद का, मंदिर का,
तीर्थों का जो मजाक कबीर ने उड़ाया है, उसको
देखकर कुछ हिंदूवादी शक्तियों की भावनाएं भी आहत होने लगें। क्या आपको नहीं लगता
कि हिंदू-मुसलमानों के पाखंडों की आलोचना करते हुए कबीर आज की तुलना में अपने समय में
अधिक सुविधाजनक स्थिति में थे? आज हम जरा वेद, कुरान, मंदिर-मस्जिद पर टिप्पणी करके तो
देखें। कबीर आज भी प्रासंगिक हैं, लेकिन ज्यादा चुनौतीपूर्ण अर्थों में। आज जैसी
चुनौती कबीर के सामने है, उनके समय में शायद नहीं थी! कबीर के समय में उनका कोई
संप्रदाय नहीं था कि उनके लिए- उनके पक्ष में उठ खड़ा होता और उनके समर्थन में लाठियाँ
भांजता। कबीरपंथी मठ तो बाद में बने, ऐसा इतिहासकारों का कहना है| और मठ भी कैसे? उन
मठों में आप जाएँ तो पाएँगे कि कबीर जिन चीजों का विरोध करते आए थे, वही
चीजें वहाँ प्रतिष्ठित हैं, मसलन- अवतारवाद, मूर्तिपूजा, कर्मकांड
आदि। कबीर आज हमारे समय, समाज, राजनीति और अकादमिक जगत के लिए अपने समय से अधिक
बड़ी चुनौती हैं।
कबीर के जो विचार उनकी कविताओं में
व्यक्त हैं, उन सबके साथ संपूर्णता में आपकी सहमति नहीं
होगी। स्त्रियों के बारे में जो उनके विचार हैं उनसे आज किसी भी विचारवान आदमी की
सहमति नहीं होगी। स्त्रियों के बारे में उनके विचार तुलसीदास से भी भयंकर हैं।
निर्गुणपंथियों में कबीर हों या दादू, स्त्रियों के प्रति वे काफी अनुदार हैं।
निर्गुणपंथियों में नानक ही हैं, जिनके यहाँ स्त्रियों के लिए सम्मान भाव है।
कबीर ने तो स्त्री को सांप से भी अधिक जहरीला बताया है- ‘नारी
की झाईं परत, अंधा होत भुजंग’। दादू तो यहाँ तक कहते हैं कि अस्सी
साल की बुढ़िया तक पर भरोसा न करो। इस अर्थ
में कबीर हों या दादू, कैसे प्रासंगिक माने जाएँगे? वैसे
समय में निर्गुणपंथियों में नानक जैसा कवि मिलता है, जो स्त्रियों के प्रति अनुदार नहीं है-
भंडि जंमीअै भंडि निंमीअै भंडि मंगण
बीआहु।।
भंडहु होवै दोसती भंडहु चलै राहु।।
भंडु मुआ भंडु भालीअै भंडि होवै
बंधानु।।
सो फिउ मंदा आखीअै जितु जंमहि राजान।।
‘गुरू ग्रंथ साहिब’ में
संग्रहीत यह गुरू नानक देव की वाणी है। इसका भाव यह है कि स्त्री के जरिए ही यह
सृष्टि चलती है। सारा संसार उसी से जन्म लेता है। वह राजाओं-महाराजाओं की जननी है।
उसे ‘मंदा’ यानी बुरा क्यों कहा जाए? उसे
सबसे ऊपर का दर्जा देते हुए नानक ने कहा कि उसके ऊपर केवल ‘वाहिगुरु’ यानी
भगवान है।
सगुणपंथियों में सूरदास जैसा कवि मिलता
है, जिसके यहाँ स्त्री के लिए सम्मान और समता का
भाव मिलता है। इसीलिए तो सूरदास के कृष्ण पर लिखते हुए समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर
लोहिया ने कहा है कि स्त्रियाँ कहीं अगर पुरुष के बराबर दिखती हैं तो वृंदावन में
और कान्हा के साथ। मध्यकालीन साहित्य में इस घटना को डॉ. लोहिया स्त्री-पुरुष
समानता के पक्ष में विलक्षण घटना मानते हैं। इस अर्थ में हम कबीर को नहीं देख
पाते। हालांकि आलोचकों ने कहा है कि प्रत्यक्ष रूप से कबीर ने स्त्री-निंदा जरूर
की है, लेकिन स्वयं को स्त्री-रूप में रखकर विरह के जो
गीत उन्होंने लिखे हैं, उसमें स्त्री के दर्द को महसूस किया है, मसलन-
‘तड़पत
बिन बालम मोर जिया’, जैसे पदों में मध्यकाल में स्त्री की जो घरेलू
जिंदगी थी, उसकी जो विरह दशा थी, उसका मार्मिक चित्र मिलता
है, लेकिन यह तो व्याख्या का भाव हुआ। जो प्रत्यक्ष
अर्थ कबीर का हमारे सामने खुलता है वह वही है जो मध्यकालीन समाज का है। वे
मध्यकालीन सीमा का अतिक्रमण करते हुए नहीं दिखाई पड़ते, जैसा
कि वे अन्य प्रसंगों में दिखते हैं। आज हमें उनका वह रूप ठीक नहीं लगता, भविष्य
में भी नहीं लगेगा। वे जब कुंडलिनी जगाने की बात करते हैं, तब
भी हमें ठीक नहीं लगता। वह सब आज अव्यावहारिक लगता है।
वे प्रासंगिक वहाँ लगते हैं, जहाँ
वे जाति निरपेक्ष और धर्मनिरपेक्ष समाज की बात करते हैं, जहाँ
वे धार्मिक बाह्याडंबरों से मुक्त सच्ची मानवता की बात करते हैं, मंदिर-मस्जिद
से मुक्त होकर एक ऐसे ईश्वर को अपने में ही उतार लेने की बात करते हैं जो हर कण
में हर जगह है। इस रूप में मुझे लगता है कि यह भारतीय समाज और धर्म साधना के
इतिहास में धर्म की नयी प्रस्तावना है। कबीर ने कहा- ‘कबीरा
सोई पीर है, जो जाने पर पीर’। वही पीर है, वही
फकीर है, वही संन्यासी है जो दूसरों की पीर जानता है। वह
नहीं जो मंदिरों-मठों में रहता है, तरह-तरह के कर्मकांड करता है और मस्जिद में
रोजा-नमाज पढ़ता है। इस भावधारा को देखें। यही बात तुलसीदास कहते हैं- ‘परहित
सरिस धरम नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई।’ नरसी
मेहता भी यही बात कहते हैं- ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए, जिन
पीर पराई जाणी रे।’ मध्यकाल में, संपूर्ण भारत में, वे
चाहे कबीर हों, तुलसी हों,
नरसी मेहता हों, वसवन्ना
हों, शंकरदेव हों, उनके काव्य में धर्म की नई अवस्था, धर्म
की नई प्रस्तावना, धर्म की एक नई जमीन तैयार होती हुई आपको दिखाई
देगी। वह जमीन क्या है? वह जमीन है- सच्ची मनुष्यता की जमीन, वह
जमीन है- सादगी की जमीन, वह जमीन है- भाईचारे और ईमानदारी
की जमीन। हमारा स्वतंत्रता संग्राम गाँधी के नेतृत्व में मनुष्यता की इसी जमीन पर
लड़ा गया। कबीर ने छोटे-बड़े का, हिंदू-मुस्लिम का, मंदिर-मस्जिद
का जो सवाल उठाया था, उस सवाल की रोशनी में स्वतंत्रता आंदोलन लड़ा
गया। भारतीय जनता को सोचने और तर्क करने की आजादी पर लड़ा गया- हमारा स्वतंत्रता
आंदोलन। उसके भीतर आध्यात्मिक, सामाजिक,
राजनीतिक और आर्थिक हर तरह की समता का
स्वप्न था। उस स्वप्न में निश्चित रूप से कबीर का भी स्वप्न शामिल था और दूसरे
भक्त कवियों का भी। कबीर ने हमें तर्क का हथियार दिया था। यह तर्क ही है जो सभी
तरह की गैरबराबरी पर सवाल करता है। वह तर्क ही है जो पूछता है कि ये मंदिर और
मस्जिद क्यों? ये ब्राह्मण और शूद्र क्यों? यह
कर्मकांड क्यों? यह ‘क्यों’ हमारे लिए और हमारे समाज के लिए जरूरी है।
हमारे समय में मठों की, बाबाओं
की, मंदिरों की संख्या जितनी तेजी से बढ़ी है, हमारे
भीतर की सच्ची मनुष्यता की शिक्षा उतनी ही तेजी से घटी है। कबीर आदि संत कवियों ने
जिस सादगी, ईमानदारी,
अपरिग्रह आदि की बात की, आज
वह हमारे जीवन और समाज में कहीं नहीं है। यह अजब विडंबना है कि हमारे समय में कबीर
की चर्चा जितनी तेजी से बढ़ी है, उतनी ही तेजी से धार्मिक कर्मकांड बढ़ा है, उतनी
ही तेजी से नकली बाबाओं की संख्या बढ़ी है, भोग और संग्रह की प्रवृत्ति बढ़ी है। एक तरफ हम
वैज्ञानिक उपकरणों का अधिक से अधिक इस्तेमाल करते हैं, दूसरी
तरफ हम अंधविश्वास की भी गिरफ्त में हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जो देशी
भाषाओं की भारतीय पत्रकारिता थी उसमें राशिफल की ऐसी भरमार नहीं थी, जैसी
आज है, उसमें तर्कशीलता और वैज्ञानिक चेतना पर जोर था।
उस पत्रकारिता को संचालित करने वाला और पसंद करने वाला भारत का वह मध्यवर्ग था जो
भारतीय नवजागरण की पैदाइश था, जिसके खून में स्वतंत्रता आंदोलन के तराने थे।
वह मध्यवर्ग अब समाप्त हो चुका है। उसकी जगह छठे वेतनमान से अघाया हुआ मध्यवर्ग है, वह
लालची मध्यवर्ग है, जिसके लालच का कोई अंत नहीं। इसी मध्यवर्ग के
कारण हमारे समय में नकली और पांच सितारा बाबाओं की भरमार है। कबीर का साहित्य इस
मध्यवर्ग के सामने चुनौती भी है और आदर्श भी।....
कबीर ने जब कहा था कि ‘बागों
न जा रे न जा, तेरी काया में गुजलार’ - तब
उसका आशय यह था कि बाहर कहीं भटकने की जरूरत नहीं, तुम्हारा शरीर ही वह मंदिर है, जिसके
भीतर तुम्हारा साईं बसता है- तेरा साईं तूझ में, जाग सके तो जाग’।
मैंने जैसा कहा कि धर्म की एक नई प्रस्तावना,
एक नई जमीन तैयार कर रहे थे कबीर। आप
याद करें कबीर के पूर्ववर्ती कवि हैं- वसवन्ना। कन्नड़ में 12वीं
शताब्दी के हैं वसवन्ना, कबीर तो 15वीं शताब्दी के हैं। तीन सौ साल पहले वसवन्ना
ने यही प्रस्तावना दी थी-
धनी लोग तुम्हारे मंदिर बनाएंगे प्रभु,
मैं क्या बनाऊंगा, मैं
एक गरीब आदमी
मेरा तन ही मंदिर है, सिर
कलश,
दोनों पैर स्तंभ हैं
हृदय गर्भगृह
मैं कहाँ से मंदिर बनाऊंगा मेरे प्रभु
मैं एक गरीब आदमी।
वसवन्ना हों या कबीर, दक्षिण
भारत हो या उत्तर भारत, इन संतों ने लगभग 12वीं
सदी से लेकर 15वीं, 16वीं सदी तक भारतीय धार्मिक जीवन की, भारतीय
सामाजिक जीवन की, आध्यात्मिक जीवन की एक ऐसी प्रस्तावना तैयार की, जिसके
आधार पर आधुनिक भारत का निर्माण होना चाहिए था। आधुनिक युग के महानायक महात्मा गाँधी
ने उस प्रस्तावना को ठीक से समझा था। तभी उनके जीवन में इन संत भक्त कवियों की
सादगी-सच्चाई थी, तभी उनके सपनों में उन संत-भक्त कवियों के
आदर्श थे। तुलसीदास उनके प्रिय कवियों में थे। नरसी मेहता का भजन- वैष्णव जन तो
तेने कहिए.... उनका प्रिय भजन था। उन्होंने कबीर का चरखा लिया और उसके जरिए
स्वावलंबन की सीख दी। चरखा जो कबीर की रोजी-रोटी का जरिया भी था और चरखा जो उनके
आध्यात्मिक अर्थ का सबसे बड़ा रूपक भी। कबीर कहते हैं कि यह सृष्टि चरखा है और
ब्रह्म रूपी जुलाहा उसे चला रहा है। यदि कबीर के लिए चरखा रोजी-रोटी कमाने का और
स्वालंबन का जरिया है तो उसका आध्यात्मिक अर्थ भी है। गाँधी के लिए भी चरखा यही
अर्थ रखता है। वे कबीर के इस चरखे के जरिए स्वावलंबी और अध्यात्मिक भारत का सपना
देख रहे थे। गाँधी कबीर के चरखा और रामचरितमानस के रामराज्य का प्रतीकार्थ लेते
हुए एक ऐसे भारत का सपना देख रहे थे जिसमें कोई दुखी और दीन न हो।
गाँधी के लिए कबीर, तुलसी, नरसी
मेहता और दूसरे मध्यकालीन संत-भक्त कवि यदि प्रासंगिक थे तो हमारे लिए क्यों नहीं
हो सकते? आज उपभोक्तावाद और समाज में विषमता जिस कदर बढ़ी
है, वंचित वर्ग और सुविधा संपन्न वर्ग का फर्क
जितना बढ़ा है, उतना पहले नहीं था। हम ऐसे समाज में आ गए हैं, जिसके
लालच का कोई अंत नहीं है। आज हमारे समय में इतने बाबाओं का उदय क्यों हुआ है? इसलिए
कि हमारे लालच का कोई अंत नहीं है, हम और ज्यादा पाना चाहते हैं। एक कहावत है कि
लालचियों के गाँव में कोई ठग भूखा नहीं रहता। इसीलिए हम लालची लोगों के बीच इन
बाबाओं का कारोबार बहुत तेजी से बढ़ रहा है। कबीर की प्रासंगिकता पर यह गोष्ठी हो
रही है तो इस बात को याद करने की जरूरत है।
जैसा कि मैंने कहा कि कबीर धर्म और
अध्यात्म की नई जमीन तैयार करते हैं। उनके साथ एक विलक्षण और अभूतपूर्व सिलसिले की
शुरुआत होती है। वे संन्यास का अर्थ बदल देते हैं। कबीर के पहले संन्यास का अर्थ
था- घर-द्वार छोड़कर, पत्नी वगैरह से मुक्त हो कर अकेला जीवन जीना। बुद्ध पत्नी को
छोड़कर भागे थे। मतलब यह कि पत्नी संन्यास मार्ग में बाधक है, संन्यास
के लिए घर छोड़ना जरूरी है। शंकराचार्य ने तो विवाह ही नहीं किया था। यह हमारे यहाँ
संन्यास की परंपरा थी। कबीर ने घर में रहते हुए संन्यास को नया अर्थ दिया। उन्होंने
बताया कि बाल-बच्चों के साथ रहते हुए, रोजी-रोटी कमाते हुए, चरखा
चलाते हुए और कपड़ा बेचकर, पैसा कमाकर भी संन्यासी हुआ जा सकता है। यह
संन्यास का नया अर्थ था, जिसकी घोषणा कबीर ने डंके की चोट पर की। अगर यह
सब करते हुए कबीर संत-महात्मा थे तो आज के युग में महात्मा और संत वे नहीं हैं जो
धर्म का कारोबार कर रहे हैं, संत-महात्मा वे हैं जो बड़े-बड़े वैज्ञानिक हैं, चिंतक
हैं, पर्यावरणविद हैं। कबीर को आज पढ़ने का मतलब यह
है कि हम सच्ची धार्मिकता और दिखावे की धार्मिकता में फर्क करना सीखें।
कबीर को याद करने का एक अर्थ यह भी है
जो अर्थ कबीर से गाँधी तक आता है। बड़े बांधों और बड़े उद्योगों के जरिए विकास की जो
राह हमने चुनी है, उस पर कबीर का चरखा प्रश्नचिह्न लगाता है। चरखा
प्रतीक है- श्रम का, स्वालंबन का और हर हाथ में काम की गारंटी का। गाँधी
यही चाहते थे ताकि विषमता न फैले और हर हाथ को काम मिले। कबीर ने इसी के साथ
संन्यास की एक दूसरी परिभाषा भी दी कि संन्यास का मतलब दूसरों के भरोसे खाना नहीं, दूसरों
को ठगकर, चमत्कार दिखाकर, मठों, मंदिरों में बैठकर चढ़ावे का माल उड़ाना
तथा हलवा-पूड़ी खाना नहीं। संन्यास का अर्थ है खुद कमाकर खाना। परिवार के साथ रहना, पत्नी
के साथ रहना, बाल-बच्चों का पेट भरना- यह सब करके भी
संन्यासी हुआ जा सकता है, यह कबीर ने बताया। इस तरह कबीर दो विलक्षण काम
करते हैं- एक तो गार्हस्थ संन्यास की नींव डालते हैं, दूसरा
श्रमशील संन्यास की।
यह सब कैसे संभव हुआ? कबीर
जैसी शक्ति, उन जैसी मेधा, उन जैसी धर्म की नई प्रस्तावना कैसे
संभव हुई? यह प्रश्न जिज्ञासु लोगों को परेशान करता है।
इसका कोई उत्तर रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी के इतिहास में नहीं मिलता। इसका उत्तर हमें उन
इतिहासकारों से मिलता है जिन्होंने मध्यकालीन भारत के आर्थिक इतिहास की खोजबीन की
है। ऐसे इतिहासकारों में प्रमुख हैं- इरफान हबीब, जिन्होंने बताया है कि कबीर आदि
संतों का उद्भव इसलिए संभव हुआ कि दस्तकारी के बहुत सारे औजार उसी काल में आए, चरखा
उसी काल में आया। रहट भी उसी काल की देन है। तो ये जो छोटे-छोटे उत्पादन के औजार
आए, इनसे दबी-पिछड़ी जातियों को ऊपर आने का मौका
मिला। हम जानते हैं कि जब नई टेक्नोलॉजी आती है, तब नए मानवीय संबंधों का जन्म होता है।
नयी तकनीक के ही कारण मध्यकाल में धुनिया, जुलाहा,
चमार, नाई आदि दस्तकार जातियों का आर्थिक
स्वालंबन संभव हुआ। आर्थिक आधार अगर कमजोर है तो आप सिर नहीं उठा सकते। प्रेमचंद
के ‘गोदान’ में धनिया होरी को डांटती है कि क्या राय साहब के यहाँ
दौड़ते रहते हो, वे कुछ लेते-देते तो हैं नहीं; होरी धनिया को जवाब देते हुए कहता है कि
भाग्यवान! जिस पाँव के नीचे अपनी गदरन दबी हो उसको सहलाते रहने में ही भलाई है।
कबीर ब्राह्मणवाद और पुरातनवाद के गढ़ काशी में रहते हैं और उसी की आलोचना करते
हैं। जाहिर है, इसका आधार उनका आर्थिक स्वावलंबन है, जिसे
उन्होंने चरखा के जरिए प्राप्त किया है। इरफान हबीब ने जाट जाति का उदाहरण दिया
है। उन्होंने बताया है कि जाट 12वीं शताब्दी तक सिंधु नदी के किनारे रहते थे, उनकी
सामाजिक स्थिति अत्यंत नीची थी। 12वीं शताब्दी में रहट उनके हाथ लगी। उन्होंने
उसके जरिए उन्नत खेती की कला सीखी और मालदार हो गए। जब मालदार हुए तो उन्हें धर्म
की जरूरत महसूस हुई। वे नानक के एकेश्वरवाद में शामिल हो गए। बाकी हिंदू-धर्म में
ही अच्छी सामाजिक हैसियत के हकदार हो गए।
कबीर चरखा के जरिए, जिस
स्वाभिमान और आर्थिक स्वावलंबन का संदेश दे रहे थे, उसके आशय को गाँधी ने ग्रहण किया था।
उसके जरिए उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्यवाद से लोहा लिया और उसे घुटने
टेकने पर मजबूर कर दिया। लेकिन आजादी के बाद हमारे राष्ट्र निर्माताओं ने गाँधी के
आशय को धीरे धीरे छोड़ दिया। आप इलाहाबाद आनंद भवन में जाएँगे तो वहाँ इंदिरा गांधी
की शादी की तस्वीर मिलेगी। वहाँ लिखा है कि जवाहर लाल नेहरू ने जेल में रहते हुए
जो सूत काता, उससे बनी हुई साड़ी इंदिरा जी ने शादी के समय
पहनी। कोई आभूषण नहीं पहना। उन्हें फूलों से सजाया गया था। गाँधी का प्रभाव उस युग
के लोगों पर पड़ा। जवाहरलाल जैसे राजकुमार पर भी पड़ा। लेकिन उसी नेहरू ने आजादी के
बाद चरखा मार्का उद्योग-धंधों का रास्ता छोड़कर बड़े बांधों और बड़े उद्योगों का
रास्ता पकड़ा। परिणाम हम सबके सामने है।
एक बात और मित्रो, वह
यह कि भक्ति काव्य पूरी दुनिया में विलक्षण कविता है। वह चाहे जिस भाषा में लिखी
गयी हो, ब्रज में हो, अवधी में हो, पंजाबी
में हो, कन्नड़ में हो, बंगाली में हो, असमिया
में हो, वह सिर्फ कविता नहीं, वह
वो नैतिकता है, जो हमें और हमारी आत्मा को हिला कर रख देती है।
वह हमारे अंतर्जगत को बदल देने वाली कविता है। यह काम दुनिया के बड़े से बड़े कवि की
कविता नहीं करती। आप दुनिया के बड़े से बड़े कवि को पढ़ जाएँ। आप उसकी कविता को
सराहेंगे, उसकी कहानी को सराहेंगे, रूपक
और मेटाफर को सराहेंगे, आप अपने देश के कालिदास को पढ़ जाएँ, जो
कवि कुलगुरु माने जाते हैं, वे हमारी नैतिकता को उस तरह से हिलाकर नहीं
रखते जिस तरह से मध्यकालीन भारत में पैदा हुए भक्त-संत कवि। कबीर, तुलसी, वसवन्ना, शंकरदेव
को आप पढ़ें, आप एकबारगी हिल जाएँगे। वह कविता आपकी आत्मा को
झकझोरेगी। वह सिर्फ आपकी सौंदर्य-चेतना को जाग्रत भर करने का काम नहीं करेगी। आप
एक बार मन से भक्ति कविता को पढ़कर देखें, आपकी आत्मा के भीतर की कालिमा उज्ज्वलता में बदलती
जाएगी।
मुझे उम्मीद थी कि जब कबीर पर गोष्ठी
हो रही है तो आप कुमार गंधर्व का गाया हुआ कबीर का भजन जरूर सुनवाएँगे। कारण यह है
कि भाषण का उतना असर नहीं होता, जितना गायकी का होता है। कुमार गंधर्व जब गाते
हैं- उड़ जाएगा हंस अकेला.... उड़ जाएगा। इसे कुमार गंधर्व भी गा रहे हैं और आधुनिक
युग के कथाकार मार्कण्डेय इस शीर्षक से कहानी लिख रहे हैं- ‘हंसा
जाई अकेला’। मार्कण्डेय की कहानी कबीर पर नहीं है, न
आत्मा-परामात्मा पर, वह हमारे समय की सच्चाई पर है। लेकिन कबीर का
जो सूफियाना राग है, कहीं-न-कहीं उसमें गूंजता है। यही सूफियाना राग
कुमार की गायकी में गूंजता है कि उड़ना है तो इतना संचय किस लिए? यह
तन एक दिन लकड़ी की तरह जल जाएगा- देह जरै जिन लाकड़ी, केस जरै जिन घास। इसे जाना ही है तो
इतना हाय-तौबा क्यों? कबीर अगर कुमार और मार्कण्डेय के लिए प्रासंगिक
हैं तो हमारे लिए क्यों नहीं?
इसी के साथ यह भी याद करने की जरूरत है
कि आज के लेखकों-गायकों के लिए कबीर क्यों जरूरी हैं? भीष्म
साहनी जब अपना नाटक- ‘कबिरा खड़ा बाजार में’
लिखते हैं, ‘इकतारे की आंख’ जब मणि मधुकर लिखते हैं, प्रहलाद टिपानिया जब
कबीर को गाते हैं, हिन्दुस्तान-पकिस्तान के दर्जनों गायक जब कबीर को गाते हैं, तब उनको वे क्यों जरूरी लगते हैं? यहाँ थोड़े
उदाहरण दिए जा रहे हैं। दर्जनों रचनाएँ हैं- आधुनिक काल की, जिनकी पृष्ठभूमि में
कबीर हैं। आप विजयदेव नारायण साही के काव्य-संग्रह
‘साखी’ को याद कीजिए। आप देखेंगे कि उसमें जो कविताएँ हैं, उनमें
वही फक्कड़ाना अंदाज, सूफियाना मस्ती और निर्भीक शैली है जो कबीर से
विरासत में आज के कवि को मिली है।‘साखी’ की कविताएँ पढ़िए और अपने भीतर कबीर के कबीरपन
को महसूस कीजिए। ‘साखी’ की एक कविता ‘प्रार्थना: गुरु कबीर दास के लिए’ को
याद कीजिए:
परम गुरु
दो तो ऐसी विनम्रता दो
कि अंतहीन सहानुभूति की वाणी बोल सकूँ
और अंतहीन सहानुभूति
पाखंड न लगे।
दो तो ऐसा कलेजा दो
कि अपमान, महत्वाकांक्षा
और भूख
की गांठों को मरोड़े हुए
उन लोगों का माथा सहला सकूँ
और इसका डर न लगे
कि कोई हाथ ही काट खाएगा।
दो तो ऐसी निरीहता दो
कि इस दहाड़ते आतंक के बीच
फटकार कर सच बोल सकूँ
और इसकी चिंता न हो
कि इस बहुमुखी युद्ध में
मेरे सच का इस्तेमाल
कौन अपने पक्ष में करेगा।
इस कविता की भाषा पर ध्यान दीजिए, इसमें
व्यक्त वाणी पर ध्यान दीजिए, कवि-आकांक्षा को देखिए- कबीर की आत्मा समकालीन
कविता की शिराओं में दौड़ती हुई दिखाई देगी।
मित्रो, कबीर को मैं जिन अर्थों में लेता हूँ, वह
अर्थ यही है मेरे लिए। वे कल यानी अतीत में जैसे थे, आज जैसे हैं और कल यानी भविष्य में
जैसे होंगे, उसकी एक हल्की बानगी, मैंने
आपके सामने पेश की। उनके कुछ विचार आज हमें प्रासंगिक नहीं लगते, मसलन-
कुंडलिनी जगाने और स्त्रियों के प्रति उच्चरित उनके विचार। मगर कबीर का जो व्यापक
परिप्रेक्ष्य है, वह मुझे आकर्षित करता है। वह व्यापक
परिप्रेक्ष्य है- नई
आधुनिक चेतना का, नए श्रमशील और स्वावलंबी भारत के निर्माण का और
ऐसे समाज के निर्माण का जिसकी आकांक्षा हाय-हाय की नहीं, संतोष
की हो- साई इतना दीजिए..... हम लोग रोज कहते रहते हैं कि ‘साई
इतना दीजिए’ और हाय-हाय करते रहते हैं कि हे लक्ष्मी! आ जाओ, आ
जाओ। हम लोग कहते हैं कि हमारा देश आध्यात्मिक और धार्मिक देश है। लेकिन हम इतने
भोगी, विलासी और लालची हैं, जितने
पश्चिम वाले भी नहीं, जिन्हें हम भौतिकवादी कहते हैं। कबीर मुझे
प्रासंगिक लगते हैं तो इस अर्थ में कि वे हमारे लालच पर प्रश्न चिह्न लगाते हैं।
वे हमारे जीवन के पंख को नई आध्यात्मिक उड़ान देते हैं। यही काम गाँधी भी करते हैं।
गाँधी कहते हैं कि यह धरती संपूर्ण मनुष्य जाति का पेट भरने और जरूरतों को पूरा
करने के लिए काफी है, लेकिन यह धरती एक आदमी के लालच को पूरा करने के
काबिल नहीं। आप कबीर से, कबीर के निस्पृह भाव से, गांधी
के इस भाव को, राजनीतिक चिंतन को जोड़ें, तब
आपको लगेगा कि कबीर हमारे समय के लिए कितने जरूरी हैं।
अंत में मैं फिर याद दिलाऊँ, कबीर
कहते हैं और कुमार गंधर्व गाते हैं कि ‘उड़ जाएगा हंस अकेला’।
इस उड़ते हुए हंस के खेल को पहचानने वाले कबीर की याद का, यह
जो उपक्रम आपने किया है, उसमें शामिल होकर मुझे अच्छा लगा। मेरे लिए यह
साहित्यिक विमर्श भर नहीं, जीवन-मरण के प्रश्न की तरह सामाजिक और
आध्यात्मिक यात्रा है...
(24
अक्टूबर, 2013 को महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय,
रोहतक के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित
संगोष्ठी में दिए गए बीज वक्तव्य का लिखित एवं किंचित परिवर्धित-सम्पादित रूप)
प्रस्तुति: रूपेश कुमार शुक्ल
महत्वपूर्ण लेख। दूसरे संत कवियों (ख़ासकर नानक) के उल्लेख ने सन्दर्भ को ज़रूरी विस्तार दिया है। सहेज रहा हूं सर।
ReplyDeleteनये ढंग से देखने का प्रयास ...अच्छा लगा।
ReplyDeleteउत्कृष्ट विचार .....नयी खोज
ReplyDeleteBhuat auttam
ReplyDeleteनयी रश्मि ,,,धन्यवाद सर .
ReplyDeleteबहुत बढ़िया लेख!
ReplyDeleteव्यावहारिक आलोचना... एक अलग आस्वाद के साथ कबीर को समझना अच्छा लगा..
ReplyDeleteBahut badiya. BADHAI
ReplyDeleteसर, लेख पढ़ा. इस संदर्भ में निम्न बातें कहना चाहूंगा-
ReplyDelete1. जिस तरह आपने फेसबुक और ब्लॉग पर आकर संवादधर्मिता की नई पहल की है, उसी तरह कबीर पर लिखते/बोलते हुए एक अच्छी फिल्म को याद कर हिंदी आलोचना की इस नवीनता का भी बोध कराया है जिसमें फिल्म आदि साहित्येतर कला-माध्यम तुच्छ या त्याज्य नहीं है. याद आती है 'अकथ कहानी प्रेम की' की शुरूआत जिसमें 'गाइड' फिल्म के एक दिलचस्प दृश्य का जिक्र किया गया है.
2. लेख/भाषण अच्छा है. प्रासंगिकता के प्रश्न पर विचार करने का अंदाज भी पसंद आया. सबसे दिलचस्प है कबीर के माध्यम से हमारे समय की समीक्षा करना.
3. आलेख में जो बात खटकी, वह है, कबीर के सपने से गांधी को तो कई बार जोड़ा गया (अन्य राजनेताओं को भी जोड़ा) लेकिन जिन कबीर को अंबेडकर अपना आदर्श और प्रेरणास्रोत मानते थे, उनको सायास या अनायास किनारे कर देना. गांधी कई संदर्भों में महत्वपूर्ण हैं लेकिन जातिवाद और ब्राह्मणवाद से लड़ने का कबीर जैसा साहस महात्मा गांधी के अंदर नहीं दिखता. 'जो घर फूंके आपनो, चलै हमारे साथ' की भावना गांधी के अंदर नहीं, अंबेडकर के अंदर दिखाई देती है. कबीर के काव्य में ब्राह्मणवाद की बृहद आलोचना है, जो गांधी में दिखाई नहीं पड़ती. वर्णाश्रम धर्म की आलोचना कबीर की मूल चिंता थी और गांधी चार-पांच सौ साल बाद भी केवल अस्पृश्यता निवारण तक ही पहुंच सके और वर्णाश्रम के कट्टर समर्थक बने रहे.
वास्तविक बनती जा रही आभासी दुनिया में आपका पुनः स्वागत है. आशा है संवाद बना रहेगा.